एब्स्ट्राक्ट डायलॉग - समकालीन भारतीय कला प्रदर्शनी | Abstract Dialogue Contemprorary Indian Art Exhibition | Stupa 18 Gallery Noida

Abstract Dialogue Exhibition
Abstract Dialogue Exhibition 

कला समीक्षक की दृष्टि से निजी आर्ट गैलरियाँ केवल प्रदर्शनी–स्थल नहीं, बल्कि समकालीन कला–संवाद (Contemprorary Art) के सक्रिय केंद्र होती हैं। वे कलाकार, दर्शक और संग्राहक के बीच एक जीवंत सेतु निर्मित करती हैं, जहाँ रचना केवल देखी नहीं जाती, बल्कि उसकी व्याख्या, विमर्श और आलोचनात्मक मूल्यांकन भी संभव होता है। उभरते कलाकारों को मंच, पहचान और कला–बाज़ार से जुड़ने का अवसर प्रदान करना इन गैलरियों की महत्वपूर्ण भूमिका है, जिससे नई प्रतिभाएँ सामने आती हैं और कला–परिदृश्य निरंतर गतिशील बना रहता है।


    निजी गैलरियाँ प्रायः प्रयोगधर्मी, वैकल्पिक और वैचारिक कला को भी स्थान देती हैं, जिससे विविध सौंदर्य–बोध और नई कलात्मक प्रवृत्तियों का विकास होता है। एक समीक्षक के लिए यह विविधता अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यहीं से कला के नए विमर्श और दिशा का जन्म होता है। इस प्रकार, निजी आर्ट गैलरियाँ रचनात्मकता के संरक्षण, संवर्धन और आलोचनात्मक संवाद के आवश्यक सांस्कृतिक मंच हैं।


Stupa 18 Gallery Noida


Stupa 18 gallery noida
Stupa 18 Gallery 

  स्तूपा-18 गैलरी इसका एक सशक्त उदाहरण है। इसकी स्थापना वर्ष 2010 में कला संग्राहक महेश बंसल द्वारा की गई। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित यह गैलरी समकालीन और पारंपरिक भारतीय कला को समर्पित एक स्वतंत्र और सक्रिय कला–स्थल के रूप में विकसित हुई है। नोयडा, उत्तर प्रदेश में स्थित यह गैलरी एक रचनात्मक केंद्र के रूप में कार्य कर रही है, जहाँ कला–प्रेमी, संग्राहक और जिज्ञासु दर्शक पेंटिंग, मूर्तिकला और मिश्रित माध्यम की समकालीन, लोक कृतियों के साथ प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करते हैं। गैलरी का उद्देश्य कला को व्यापक दर्शक वर्ग के लिए सुलभ, सार्थक और प्रासंगिक बनाना है, साथ ही नवाचार और सांस्कृतिक विरासत के बीच संतुलित संवाद कायम रखना है।


    महेश बंसल की परिकल्पना प्रारंभ से ही कलाकारों को उनके करियर के विभिन्न चरणों में सहयोग देने की रही है। उनके मार्गदर्शन में गैलरी ने कई स्थापित एवं उभरते कलाकारों की कृतियों को संग्रहित और  प्रदर्शित किया है, जो इसकी समावेशी और प्रोत्साहनकारी दृष्टि को दर्शाता है।


Apurva singh paintings

   स्तूपा-18 गैलरी की प्रदर्शनी–परियोजनाएँ साहसिक अमूर्त रचनाओं से लेकर अभिव्यक्तिपूर्ण आकृतिमूलक कार्यों तक फैली हुई हैं। पारंपरिक तकनीकों और आधुनिक संवेदनाओं के संगम के माध्यम से यह गैलरी भारत की समृद्ध कलात्मक परंपरा और उसके विकसित होते वर्तमान के बीच एक सार्थक सेतु का निर्माण करने का प्रयास कर रही है। प्रदर्शनियों के अतिरिक्त, कलाकार पोर्टफोलियो आमंत्रण, क्यूरेटेड शो और विषय–आधारित प्रस्तुतियाँ इसे एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र बनाती हैं। इसका अंतरंग और सुव्यवस्थित प्रदर्शनी–स्थल दर्शकों को प्रत्येक कलाकृति से आत्मीय जुड़ाव का अनुभव कराता है। इस प्रकार, स्तूपा-18 गैलरी न केवल एक निजी आर्ट गैलरी है, बल्कि समकालीन भारतीय कला–परिदृश्य में संवाद, प्रेरणा और समुदाय का एक महत्वपूर्ण मंच भी है।


     स्तूपा-18 ने अपने योजनाओं के अगली कड़ी में इस प्रदर्शनी “एब्स्ट्राक्ट डाइलॉग” में तीन समकालीन कलाकारों में नई दिल्ली से रश्मि खुराना, बनारस से अपूर्व और मथुरा से रजनी आर्या को अवसर दिया है। यह तीनों कलाकार स्वयं को कला के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण रूप से स्थापित करने की दिशा में अग्रसर हैं।


Artist Apurva Singh

  

  अपूर्व (उत्तर प्रदेश) एक युवा समकालीन कलाकार हैं, जिनकी कला मानवीय भावनाओं, अमूर्तन और आध्यात्मिकता के अंतर्संबंधों की गहन पड़ताल करती है। पिछले सोलह वर्षों से देश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय प्रदर्शनियों, कला शिविरों और रेज़ीडेंसी में सहभागिता के माध्यम से उन्होंने अपनी एक विशिष्ट दृश्य भाषा विकसित की है। बनारस के निवासी अपूर्व की कला-प्रक्रिया शहरी जीवन की सघनता—भीड़, गति, मौन और आत्ममंथन—के बीच आकार लेती है।

उनकी चल रही श्रृंखला “मेटाफर ऑफ लाइफ” सामूहिक मानवीय उपस्थिति, स्मृतियों और भावनात्मक अवशेषों के संचयन को दृश्य रूप देती है। परतों, खंडित रूपों और बहुस्तरीय टेक्सचर के माध्यम से वे दिखाते हैं कि अनुभव समय के साथ कैसे संचित होकर हमारी आंतरिक संरचना का हिस्सा बन जाते हैं। उनकी प्रक्रिया सहज रेखांकन से आरंभ होकर मिश्रित माध्यम, चारकोल और विविध पदार्थों के हस्तक्षेप तक विकसित होती है, जहाँ पुनरावृत्ति, विराम और व्यवधान मिलकर एक जीवंत संरचना का निर्माण करते हैं।


    अपूर्व की अमूर्त कृतियों में रूप और रंग के बीच जटिल किंतु संतुलित संवाद दिखाई देता है। नीले-हरे रंगों की शीतलता चिंतनशील वातावरण रचती है, जबकि नारंगी-मिट्टी के रंग ऊर्जा और अस्तित्वगत ताप को उभारते हैं। रेखाएँ यहाँ सीमांकन नहीं, बल्कि गतिशील प्रवाह हैं—जो रूपों को बाँधती भी हैं और तोड़ती भी। ज्यामितीय खंड, पारदर्शी परतें और विखंडित संकेत किसी प्रत्यक्ष कथा के बजाय आंतरिक मनोभूमि का मानचित्र प्रस्तुत करते हैं।


Apurva singh Art exhibition
Abstract dialogue Art exhibition 

    कुल मिलाकर अपूर्व की कला संरचना और स्वाभाविकता, अव्यवस्था और संतुलन, तथा शहरी लय और आध्यात्मिक आत्मचिंतन के बीच एक सुसंगत समन्वय स्थापित करती है। उनकी कृतियाँ किसी बाह्य दृश्य का चित्रण नहीं, बल्कि जीवन के जटिल अनुभवों का संवेदनात्मक रूपांतरण हैं—जहाँ अनेक कथाएँ साथ-साथ जन्म लेती हैं, विलीन होती हैं और निरंतर रूपांतरित होती रहती हैं।


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Artist Rashmi Khurana

   

  रश्मि खुराना (दिल्ली) के अमूर्त पेंटिंग्स में रंगों की तीव्रता, गहराई और ऊर्जा एक साथ उभरती है। कलाकार ने मोटे और गाढ़े रंगों की परतें लगाकर सतह को उभारा है, जिससे चित्रों में बनावट स्पष्ट दिखाई देती है और उन्हें देखने के साथ-साथ उनके भाव महसूस भी किया जा सकता है। लाल रंग विशेष रूप से प्रभावी है, जो जीवन-शक्ति, आवेग, संघर्ष और भीतर की भावनात्मक उष्णता को व्यक्त करता है। नीले, बैंगनी और काले रंग चित्रों में रहस्य, गंभीरता और मानसिक गहराई जोड़ते हैं, जबकि सफेद, पीले और हरे रंग अंधकार के बीच संतुलन और आशा का संकेत देते हैं। ब्रश के स्ट्रोक खुले, तेज और आत्मविश्वास से भरे हैं, मानो भावनाएँ सीधे कैनवास पर उतर आई हों। स्पष्ट आकृतियाँ न होने पर भी इन कृतियों में एक आंतरिक लय, हलचल और मानवीय संवेदना का अनुभव होता है। रंगों का टकराव और उनका सामंजस्य जीवन के उतार-चढ़ाव, तनाव और पुनर्जन्म की कहानी कहता है।


   उनके लिए चित्रकला केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि एक निरंतर आंतरिक अनुभूति है ऐसा प्रतीत होता है। जैसा कि वे कहती हैं कि “पेंटिंग हमेशा मेरे भीतर बनी रही है।”  उनके सृजन का आधार सहज बोध (इंट्यूशन), प्रयोगधर्मिता और रेखाओं, रंगों तथा पुनरावृत्ति की शक्ति के माध्यम से मुक्त अभिव्यक्ति की खोज है। अमूर्त चित्रकला में उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। समय के साथ उन्होंने पेपर पल्प, कागज़ी कोलाज, कपड़े, धागे और हाथ की सिलाई जैसे विविध माध्यमों के भी प्रयोग द्वारा अपनी अभिव्यक्ति को और गहराई दी है, जिससे उनकी कृतियाँ केवल दृश्य नहीं बल्कि स्पर्श और अनुभव की भी भाषा बन जाती हैं। रश्मि के खाते में अनेक एकल और समूह प्रदर्शनियाँ दर्ज हैं। उनकी कृतियाँ विश्व की प्रतिष्ठित गैलरियों, कला मेलों और संग्रहालयों में प्रदर्शित हो चुकी हैं। कला और शिक्षा के माध्यम से सामाजिक सरोकारों पर सतत कार्य करने के लिए उन्हें वर्ष 2018 में दिल्ली सरकार द्वारा सम्मानित भी किया गया।


Artist Rajni Arya 


Rajni Arya Artist
  रजनी आर्या (मथुरा) समकालीन भारतीय कला परिदृश्य की एक संवेदनशील और गंभीर चिंतनशील युवा कलाकार हैं, जिनकी कला-साधना आत्मचिंतन, दर्शन और माध्यम-अन्वेषण का एक परिपक्व और सुसंगठित रूप प्रस्तुत करती है। मथुरा में निवास एवं कर्मशीलता के साथ वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहरे जुड़ी हुई हैं, किंतु उनका कलाभाष्य स्थानीय सीमाओं से परे एक व्यापक मानवीय अनुभव का रूप ले लेता है।


   टेक्सटाइल डिज़ाइन की पृष्ठभूमि ने उन्हें सतह, बनावट, संरचना और परतों के प्रति एक विशिष्ट संवेदनशील दृष्टि प्रदान की है। यही दृष्टि उन्हें औद्योगिक सामग्रियों—विशेषतः कॉपर शीट और मेटल वायर—को केवल माध्यम न मानकर जीवंत संवेदनात्मक तत्वों में रूपांतरित करने की क्षमता देती है। वे कठोर धातु को स्मृति, अनुभव और आत्मानुभूति से संपृक्त रूपों में बदल देती हैं। यहाँ औद्योगिक पदार्थ अपनी यांत्रिकता खोकर मानवीय स्पर्श ग्रहण करता है। उनकी सृजन-प्रक्रिया परिणाम की चकाचौंध से अधिक प्रक्रिया की साधना पर केंद्रित है। काटना, मोड़ना, जोड़ना, परतों का निर्माण—ये सभी क्रियाएँ मात्र तकनीकी नहीं, बल्कि आत्मावलोकन की ध्यानमग्न अवस्थाएँ हैं। वे अपूर्णताओं की कच्ची और स्वाभाविक सुंदरता को स्वीकार करती हैं। इस स्वीकृति में एक दार्शनिक विनम्रता है—मानो जीवन स्वयं अधूरापन ही अपनी पूर्णता का आधार हो। उनके कार्यों में ठोस और रिक्त स्थान का संवाद अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उपस्थिति और अनुपस्थिति के बीच की यह सूक्ष्म संवेदनशीलता अर्थ-निर्माण का केंद्र बनती है। धातु की परतों के बीच उभरते खाली स्थान दर्शक को भीतर झाँकने के लिए बाध्य करते हैं। यह रिक्तता निष्क्रिय नहीं, बल्कि अर्थ-संभावनाओं से भरी हुई है—जैसे स्मृतियों के बीच का मौन।


Is Indian Art is the bigest investement in Future | MF Hussain's Gram Yatra


   उनकी कृतियाँ अवचेतन स्मृतियों की पुरातात्विक खुदाई प्रतीत होती हैं। वे समय और पहचान को परतदार भू-भाग की तरह देखती हैं—खंडित, क्षरित, किंतु अर्थपूर्ण। कॉपर शीट को हाथ से काटने और मोड़ने की प्रक्रिया धातु की कठोरता को दरारों और नए आयामों में परिवर्तित करती है। पैटिना से उत्पन्न भूरे और नीले रंग समय, क्षरण और स्मृति के मूर्त संकेत बन जाते हैं। यहाँ रंग सजावटी नहीं, बल्कि काल-चिह्न हैं। उनकी परतदार संरचनाएँ स्थापत्य और जैविक रूपों के बीच एक संतुलन रचती हैं—मानो प्रकृति और मनुष्य-निर्मित संरचनाएँ एक साझा संवेदनात्मक धरातल पर मिल रही हों। महीन कॉपर वायर से बुनी संरचनाएँ समुद्र की लहरों जैसी लयात्मक गति का आभास कराती हैं। स्थिर होते हुए भी वे गतिशील हैं—तरलता और तनाव का सह-अस्तित्व रचते हुए। यह ऊर्जा नवीकरण, निरंतरता और मुक्त होने की इच्छा का संकेत देती है।


Abstract dialogue Art exhibition
Abstract Dialogue Exhibition


   विशेष रूप से उनकी पत्तियों की मूर्तियाँ क्षणभंगुर को स्थायित्व प्रदान करती हैं। जो तत्व प्रकृति में नश्वर हैं, वे धातु में स्थिर होकर भी भीतर गतिशील बने रहते हैं। स्मृतियाँ, जो कभी हवा में लहराती थीं, अब धातु में जड़ होकर समय का भार वहन करती हैं। यहाँ संरक्षण और परिवर्तन एक साथ उपस्थित हैं—प्रकृति का रूपांतरण, किंतु उसकी आत्मा का संरक्षण।


    उनकी दो एकल और अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर समूह प्रदर्शनियों में सहभागिता कर चुकी हैं। यह उपस्थिति उनके कार्य की संस्थागत स्वीकृति और व्यापक कलात्मक संवाद का प्रमाण है। कुल मिलाकर राजनी आर्या की कला केवल रूप-सौंदर्य का अन्वेषण नहीं, बल्कि आंतरिक भू-दृश्य की खोज है। वे दर्शक को अपनी जड़ों, पहचान और स्मृतियों की परतों में उतरने का आमंत्रण देती हैं। उनकी कृतियाँ हमें यह अनुभव कराती हैं कि समय, क्षरण और अपूर्णता ही जीवन की वास्तविक सौंदर्य-भूमि हैं—जहाँ धातु भी स्मृति बन सकती है और रिक्तता भी अर्थ।


भूपेंद्र कुमार अस्थाना

(कलाकार,क्यूरेटर एवं कला समीक्षक )


Bhupenda kumar Asthana Artist writer Curator

     कला समीक्षक परिचय - भूपेंद्र कुमार अस्थाना का जन्म 10 जनवरी 1985 को ग्राम मंगरावां, बिंद्रा बाज़ार, जनपद आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के कला एवं शिल्प महाविद्यालय से वर्ष 2012 में ललित कला (दृश्य कला) में स्नातक तथा छापाकला में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2011 में इन्हें 30वीं राज्य ललित कला अकादमी, उत्तर प्रदेश द्वारा छापाकला में राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साथ ही 2012–13 में राज्य ललित कला अकादमी उत्तर प्रदेश तथा 2018–19 में राष्ट्रीय ललित कला अकादमी, नई दिल्ली द्वारा “कला संयोजन एवं प्रलेखन” में राष्ट्रीय छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई।


    वर्ष 2014–16 तक कला स्रोत  तथा 2019 से वर्तमान तक फ्लोरेसेन्स आर्ट गैलरी में आर्ट क्यूरेटर एवं सलाहकार के रूप में सक्रिय हैं। कला स्रोत एवं नादरंग हिंदी कला पत्रिका में सह-संपादक के रूप में भी कार्य किया। 2019 में विश्वरंग अंतर्राष्ट्रीय कला एवं साहित्य सम्मेलन, भोपाल में सहभागिता की। लगभग एक दशक से अधिक समय से लखनऊ में रहकर स्वतंत्र चित्रकार, कला संयोजक, प्रलेखक, लेखक एवं समीक्षक के रूप में निरंतर कार्यरत हैं।


    देश-विदेश के लोक एवं समकालीन कलाकारों पर संवाद, दस्तावेज़ीकरण और लेखन इनकी प्रमुख पहचान है। विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं, कैटलॉग, पोर्टल और ब्लॉग पर नियमित कला लेखन करते रहे हैं तथा दूरदर्शन व अन्य माध्यमों पर समय-समय पर कला विमर्श में भी उपस्थित होते हैं। 2014 से लखनऊ की कई निजी कला वीथिकाओं की स्थापना, क्यूरेशन, प्रदर्शनियाँ, संगोष्ठियाँ और डिजिटल प्रस्तुतियों का सफल आयोजन करते रहे हैं। देश-विदेश की अनेक सामूहिक प्रदर्शनियों और कला शिविरों में भी भागीदारी रही है।


     समकालीन कला में विविध माध्यमों के प्रयोग, कला लेखन, आयोजन और शैक्षणिक संवाद के माध्यम से कला जगत में सतत योगदान दे रहे हैं। इनका विश्वास है कि मौलिकता ही कलाकार की वास्तविक पहचान है, और इसी विचारधारा के साथ वे निरंतर सृजनशील हैं। वर्तमान में लखनऊ में रहकर कला सृजन, कला समन्वय, परामर्श एवं क्यूरेशन के क्षेत्र में सक्रिय हैं।


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